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उन पथराई आँखों को देखा...

Posted On: 23 Jun, 2010 Others में

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oldyये बात कल की है, जब हम उस रास्ते से गुज़र रहे थे… तभी अचानक, उन आँखों पर नज़र गयी… मजबूर, लाचार, इंतज़ार करती हुईं, और ये सोची हुई कि आज घर क्या लार जाना है?
ये सड़क किनारे किताब बेचनेवाले एक बूढ़े कि बात है… न जाने क्यूं अनायास ही उसने मेरा ध्यान आकर्षित किया और मैं बस उसकी आँखे देखती रह गयी, या शायद उसकी मजबूरी पढने और समझने की पूरी कोशिश कर रही थी… वो हर आने-जाने वाले को एक उम्मीद के साथ देखता और जब वो इंसान वहां से यूँही, बिना कुछ लिए गुज़र जाता तो उसकी आँखों को निराशा की परछाई घेर लेती… शायद वो कुछ पुरानी किताबे लिए था, कोई व्रत की थी तो कोई किसी भगवान की आरती, और कोई किसी भगवान का पूजन-संग्रह… वही पतली-पतली किताबों का ढेर, और एक दूकान के बाहर छोटा-सा कोना… अचानक से मौसम घिर आया, बादल छा गए, ऐसा लगा जैसे कितनी जोरों की बारिश होगी… तभी वो बुड्ढे बाबा ने उन साड़ी किताबों को एक बड़ी-सी पीली पोलिथीन में लपेटा और दुकानवाले को सहेज कर कहीं जाने लगे… जब देखा कि वो कहाँ जा रहे हैं, तो पता चला कि आगे एक चाय कि दूकान थी… चलो! किताबे नहीं बिकी, बदल घिर आये पर उन्हें चाय पीने का मौका तो मिल गया…
पर नहीं, वो वहां चाय पीने नहीं गए थे, बल्कि चाय के बर्तन धोने गए थे… हे! भगवान ये क्या हो रहा था?
जब मेरे ड्राइवर ने मुझे यूँ उन्हें घूरते देखा तो उसने पूरी कहानी बताई… कहा “दीदी जी, ये आदमी रोज़ यहीं किताबें बेचता है, और उसी चाय के ठेले में जाकर बर्तन भी साफ़ करता है… इसका ये रोज़ का नियम है… आप पहली आर देख रही हैं न, इसीलिए आपको अजीब लग रहा होगा…” मैंने उनसे कहा कि “क्यूं भैया, क्या इनके घर में और कोई नहीं जो काम करता हो?” उन्होंने कहा ” हैं न, इनके दो लड़के हैं जिनकी शादी हो चुकी है, पर वो इन्हें अपने साथ नहीं रखते,  बेटी भी थी पर उसे उसके ससुराल वालों ने दहेज़ के लिए मारडाला, और इनकी पत्नी तो बोहोत पहले ही ख़तम हो गयीं थीं”… मुझे बहुत ही जोर-से गुस्सा आया, कि कैसे बच्चे हैं, जिसने पला-पोसा, बड़ा किया , आज वही इन्हें अपने साथ नहीं रखते, बेचारे बाबा… मुझसे रहा नहीं गया और मैंने पूछा कि “इनके दोनों लड़के ऐसे हैं या उनकी पत्नियों ने नहे घर से निकलवा दिया?”… तब पता चला कि नहीं
, न तो लड़के ख़राब हैं और न ही उनकी पत्नियाँ, ख़राब यदि कुछ है तो वो नहीं नियति…
भैया ने बताया कि, “पहले इनके खुद के चाय-भजिया का एक होटल था, होटल बहुत बड़ा तो नहीं था, पर मशहूर बहुत था, पूरे शहर में नाम था और बड़े-बड़े घरों के लोग भी इनके यहाँ के पर्मानेंट कस्टमर भी थे… तीनो बच्चों कीशादी भी अच्छे घरों में हुई, पर न जाने अचानक कहाँ से काल ने आकर इन्हें घेर लिया… इनकी लड़की के ससुराल वालों की मांगे शुरू होने लगी, पहले तो साड़ी मांगे पूरी कर दी इन्होने पर जा मांगी जाने वाली चींजो की कीमते बढ़े लगीं तो इन्होने और इनकी लडकी ने विरोध किया, तो लडकी के साथ मार-पीट हुई, पहले तो उसने अपने मायके में कुछ नहीं बताया, पर एक दिन वो अपने मायके आई और भाभियों से उसने अपनी व्यथा सुनाई, सब परेशान हो गए थे… बहुओं ने कहा कि पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा देते हैं, पर बाप ने मन कर दिया कि कहीं आगे जाकर उनकी लड़की को कोई दिक्कत न हो, और उन्होंने लड़की के ससुरालवालों कि मांग पूरी कर दी, और लड़की को ससुराल भेज दिया, इस उम्मीद के साथ कि अब उनकी लड़की खुश रहेगी, पर एक हफ्ते बाद ही अचानक से खबर आई कि उनकी लड़की ने आत्महत्या कर ली… सभी के पैरों के नीचे-से जैसे ज़मीं ही खिसक गयी हो… लाख कोशिशि की ये साबित करने कि ये आत्महत्या नहीं क़त्ल है, पर कोई फायद नहीं हुआ… कुछ महीनों बाद पता चला कि लड़का बाहर किसी लड़की को पसंद करने लग गया था, और ये दहेज़-प्रताड़ना, मार-पीट सब सिर्फ बहाना था कि लड़की अपने पति को तलाख दे दे, और वो दूसरी शादी करने को आज़ाद हो जाये… और-तो-और उसके माँ-बाप भी इस कृत्य में शामिल थे क्योंकि वो दूसरी लड़की के घरवाले ज्यादा दहेज़ देने को बोल रहे थे… और तब से ये बाबा अपनी लड़की की मौत का ज़िम्मेदार खुद को मानते हैं… इन्होने उसकी मौत के बाद खुद घर भी छोड़ दिया, लड़के और बहुओं ने बहुत कोशिश की कि ये घर वापस चले जाएँ, पर ये नहीं गए… रोज़ यहीं किताबें बेचेंगे और उस दूकान में बर्तन, कभी-कभी तो कुछ दुकानों में झाड़ू-कटका भी करते हैं, जो पैसे मिलते हैं उनसे रात में कुछ भी खाते और शराब पीते हैं… और फ़िर यहीं-कहीं फुटपाथ में सो जाते हैं… बस ऐसे ही चल रही है इनकी ज़िन्दगी…”
ये सब सुनने के बाद समझ नहीं आया कि क्या कहूँ, या करूँ? आखिर इनके भी लड़के हैं, ये भी बहुएँ लेकर आये… लड़की कि मृत्यु के दुःख ने उन्हें तोड़ दिया… शायद, इन्हें लगता है कि यदि ये पुलिस में रिपोर्ट दज करा देते तो ठीक था, या शायद ये कि उन्होंने अपनी लड़की के लिए सही लड़का नहीं चुना? न जाने क्या… पर शराब का सहारा लेना क्या उचित हैं?
कभी-कभी कुछ बातों का निष्कर्ष निकालना कितना मुश्किल हो जाता है…?

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516 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

samta gupta kota के द्वारा
June 24, 2010

पूजा जी,उन बाबा का शराब का सहारा लेना उचित है कि नहीं उनकी मानसिक स्थिति मैं आये बिना इसका जवाब देना मुश्किल है,वो बाबा प्रायश्चित कर रहा है शायद उस पाप का जो उनकी लड़की के ससुराल वालों ने किया,वस्तुतः वो सारे समाज की इसमें मौन स्वीकृति के पाप का भी प्रायश्चित कर रहे हैं,पाप हमारे सभी के प्रायश्चित उनका,गुनाहगार हम सभी हैं जिनकी मौन स्वीकृति किसी को जीवन से बेजार कर देती है,

    Karsen के द्वारा
    July 12, 2016

    Your story was really inrmtoafive, thanks!

Manoj के द्वारा
June 24, 2010

बेहद दर्द भरी कहानी ………..

    Jailene के द्वारा
    July 12, 2016

    Råkade hamna här när jag sökte på badriumsnnrerning. Vilken underbar sida! Är det storebror som nu har våningssängen?Du verkar ha fått till det där lilla extra.Ha det bra!Mia

ajaykumarjha1973 के द्वारा
June 23, 2010

बहुत ही दर्दनाक वाकया सुनाया आपने । एक कानूनविद के रूप में देखूं तो उन्हें बेटी पर हुए अत्याचार को न तो खुद सहना चाहिए था और न ही बेटी को सहने देने चाहिए था । ऐसे वाकए , समाज पर क्षुब्दधता बढा देते हैं

    kaushalvijai के द्वारा
    June 24, 2010

    पूजा जी, आपने बड़ा मार्मिक लेख लिखा है. लेकिन इस तरह लोगों को देखकर कुछ होने वाला नहीं है. सरकार बहुत सारी योजनाये वृद्धों के लिए बना रक्खी है. जरुरत है तो आप जैसे लोगों की जो एक ngo के तरह सब लोग जुड़कर कुछ रचनात्मक कार्य करें.


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